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बिहार में शराबबंदी पर NDA में फिर मतभेद, मांझी-चिराग के सुर अलग; JDU ने संभाला मोर्चा

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | बिहार में शराबबंदी को लेकर NDA के भीतर फिर मतभेद के संकेत हैं। जीतन राम मांझी ने गुजरात मॉडल की बात कही, चिराग पासवान ने समीक्षा की मांग की, जबकि JDU शराबबंदी के समर्थन में खड़ा है।

पटना, 17 अगस्त। बिहार में करीब एक दशक से लागू शराबबंदी अब एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। इस बार सवाल विपक्ष की ओर से नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ NDA के भीतर से उठ रहे हैं। हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) के संरक्षक और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने शराबबंदी को गुजरात मॉडल के आधार पर लागू करने की बात कही है, जबकि लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने मौजूदा व्यवस्था की सफलता और विफलता की समीक्षा की जरूरत बताई है।

इन दोनों बयानों के बाद जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने शराबबंदी के अपने पुराने रुख को दोहराते हुए इसका बचाव शुरू कर दिया है। JDU नेताओं का कहना है कि शराबबंदी ने बिहार में खासकर महिलाओं और परिवारों को लाभ पहुंचाया है।

2016 में लागू हुई थी शराबबंदी

बिहार में शराबबंदी की शुरुआत वर्ष 2016 में नीतीश कुमार सरकार के कार्यकाल में हुई थी। उस समय इसे सामाजिक सुधार की बड़ी पहल के तौर पर पेश किया गया था। सरकार का तर्क था कि शराब की वजह से परिवारों की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है और घरेलू हिंसा समेत कई सामाजिक समस्याएं बढ़ती हैं।

समय के साथ शराबबंदी बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की प्रमुख नीतियों में शामिल हो गई। लेकिन लगभग दस साल बाद अब NDA के ही कुछ सहयोगी दल इस व्यवस्था की समीक्षा और उसमें बदलाव की बात कर रहे हैं।

जीतन राम मांझी ने गुजरात मॉडल का दिया सुझाव

बहस की शुरुआत HAM के संरक्षक जीतन राम मांझी के बयान से हुई। उन्होंने बिहार में लागू पूर्ण शराबबंदी को गुजरात मॉडल की तर्ज पर ले जाने की बात कही।

गुजरात में भी शराब पर प्रतिबंध है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में परमिट व्यवस्था और कानूनी अपवाद मौजूद हैं। मांझी के बयान को बिहार में मौजूदा शराबबंदी व्यवस्था में बदलाव के सुझाव के तौर पर देखा जा रहा है।

उनके बयान के बाद शराबबंदी को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई।

चिराग पासवान ने समीक्षा की बात कही

जीतन राम मांझी के बाद LJP (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने भी शराबबंदी को लेकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि शराबबंदी लागू हुए करीब दस वर्ष हो चुके हैं, इसलिए इसकी सफलता और विफलता का गंभीरता से आकलन किया जाना चाहिए।

चिराग के बयान ने बहस को और व्यापक कर दिया। अब चर्चा केवल शराबबंदी जारी रखने या हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी सवाल उठ रहा है कि पिछले एक दशक में इस नीति से बिहार को क्या हासिल हुआ और इसके सामने कौन-कौन सी चुनौतियां हैं।

JDU ने शराबबंदी पर संभाला मोर्चा

NDA के सहयोगी दलों के बयानों के बाद JDU नेताओं ने शराबबंदी के समर्थन में खुलकर बयान देना शुरू कर दिया। पार्टी का रुख स्पष्ट है कि शराबबंदी को कमजोर करने के बजाय इसके सामाजिक प्रभाव को देखा जाना चाहिए।

JDU नेताओं का कहना है कि शराबबंदी से महिलाओं को फायदा हुआ है और कई परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है। पार्टी नेताओं ने शराबबंदी के पक्ष में सरकार की उपलब्धियां गिनाते हुए सहयोगी दलों के सुझावों से अलग अपना रुख सामने रखा है।

NCAER सर्वे के बाद बढ़ी बहस

शराबबंदी पर ताजा राजनीतिक बहस की एक बड़ी वजह नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च यानी NCAER से जुड़ी सर्वे रिपोर्ट भी है। रिपोर्ट के हवाले से शराबबंदी के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को लेकर सवाल उठे।

इसमें महिलाओं के खिलाफ हिंसा, सरकारी राजस्व और अवैध शराब के कारोबार जैसे मुद्दों पर चर्चा सामने आई। इसी के बाद शराबबंदी की प्रभावशीलता को लेकर राजनीतिक बहस तेज हुई।

हालांकि JDU ने सर्वे के निष्कर्षों पर सवाल उठाए हैं। पार्टी नेताओं ने सर्वे के सैंपल साइज, उसके क्षेत्र और सर्वे की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं।

JDU ने सर्वे पर उठाए सवाल

JDU नेताओं का तर्क है कि शराबबंदी के प्रभाव को केवल किसी एक सर्वे के आधार पर नहीं आंका जा सकता। पार्टी ने सर्वे की पद्धति और आंकड़ों को लेकर सवाल उठाते हुए कहा है कि बिहार में शराबबंदी के सामाजिक प्रभाव को समझने के लिए व्यापक स्तर पर मूल्यांकन जरूरी है।

JDU नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि शराबबंदी के खिलाफ बोलने वाले कुछ लोगों के हित शराब कारोबार से जुड़े हो सकते हैं। हालांकि ऐसे राजनीतिक आरोपों को लेकर संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी।

मंत्री शीला मंडल ने गिनाए फायदे

JDU की ओर से मंत्री शीला मंडल ने शराबबंदी के समर्थन में बयान दिया। उन्होंने कहा कि इस नीति से महिलाओं को लाभ हुआ है और परिवारों पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

इसके बाद मंत्री अशोक चौधरी ने भी शराबबंदी के पक्ष में अपनी बात रखी। उप मुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने भी शराबबंदी के कारण हुए फायदों को गिनाते हुए सरकार के रुख का समर्थन किया।

इस तरह NDA के भीतर शराबबंदी को लेकर अलग-अलग राय खुलकर सामने आने लगी है।

अब सवाल आगे की दिशा पर

बिहार में शराबबंदी को लेकर फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार मौजूदा व्यवस्था को किस तरह आगे बढ़ाती है। एक तरफ JDU इसे सामाजिक सुधार की महत्वपूर्ण नीति मानता है, तो दूसरी तरफ NDA के सहयोगी दल इसकी समीक्षा या मॉडल में बदलाव की बात कर रहे हैं।

सरकार के सामने चुनौती यह भी है कि शराबबंदी के दौरान अवैध शराब के कारोबार पर प्रभावी रोक कैसे लगाई जाए और नीति के सामाजिक लाभ को कैसे बरकरार रखा जाए।

आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर NDA के भीतर और चर्चा होने की संभावना है। फिलहाल JDU ने साफ कर दिया है कि वह शराबबंदी के अपने मूल रुख से पीछे हटने के पक्ष में नहीं है।

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शराबबंदी पर बहस का अगला चरण क्या होगा?

बिहार में शराबबंदी अब केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रह गई है। यह सामाजिक नीति और राजनीतिक मुद्दा भी बन चुकी है। करीब दस साल बाद सहयोगी दलों के अलग-अलग सुझाव सामने आने से यह बहस फिर तेज हुई है।

मांझी का गुजरात मॉडल का सुझाव और चिराग पासवान की समीक्षा की मांग यह संकेत देती है कि NDA के भीतर इस नीति के तरीके और प्रभाव को लेकर विचार अलग हो सकते हैं। दूसरी तरफ JDU लगातार शराबबंदी को सामाजिक बदलाव की नीति के रूप में बचाव कर रहा है।

ऐसे में आगे की चर्चा आंकड़ों और जमीनी प्रभाव के आधार पर होना ज्यादा उपयोगी होगा। कितने परिवारों को फायदा हुआ, अवैध शराब पर कितना नियंत्रण हुआ, राजस्व पर क्या असर पड़ा और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े आंकड़े क्या कहते हैं—इन सभी पहलुओं का निष्पक्ष मूल्यांकन जरूरी है।

राजनीतिक बयानबाजी से अलग यदि सरकार स्वतंत्र और व्यापक समीक्षा कराए, तो भविष्य की नीति के लिए ज्यादा स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकती है।

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